ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” न्योते पर भारत दुविधा में: गाजा, दो-राष्ट्र समाधान और कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” के लिए भारत समेत कई देशों को न्योता मिला है। इस पहल का लक्ष्य गाजा में संघर्षविराम को मजबूत करना और अंतरिम प्रशासन की निगरानी बताई गई। भारत के सामने दुविधा यह है कि वह एक ओर इस्राएल से मजबूत रिश्ते रखता है, दूसरी ओर फलस्तीन मुद्दे पर पारंपरिक रुख और दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन भी बनाए हुए है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने “बोर्ड ऑफ पीस” (बीओपी) नाम की पहल दुनिया के सामने रखी है, जिसका उद्देश्य गाजा में इस्राएल-हमास संघर्षविराम को मजबूत करना और फलस्तीनी क्षेत्र में एक अंतरिम सरकार की निगरानी बताया गया है। इस बोर्ड में शामिल होने के लिए भारत को भी न्योता मिला है, लेकिन नई दिल्ली अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि वह इसमें शामिल होगी या नहीं।

भारत के सामने रणनीतिक संतुलन
भारत की दुविधा की एक बड़ी वजह यह है कि पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत-इस्राएल संबंध काफी मजबूत हुए हैं। साथ ही भारत ने फलस्तीन के मुद्दे पर भी अपना पारंपरिक स्टैंड बनाए रखा है और लंबे समय से शांति वार्ता व दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है। ऐसे में बीओपी में शामिल होना भारत की उसी “संतुलित नीति” की परीक्षा बन सकता है।
कानूनी अस्पष्टता, लागत और राजनीतिक जोखिम
रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश नीति विशेषज्ञों के बीच इस पर मतभेद हैं। कुछ जानकार इसे वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका बढ़ाने और कूटनीतिक प्रभाव को मजबूत करने का अवसर मानते हैं, जबकि अन्य इसके ढांचे, भूमिका और भविष्य को लेकर स्पष्टता की कमी की ओर इशारा करते हैं। चर्चा में यह भी आया कि स्थायी सदस्यता के लिए कथित तौर पर बड़े आर्थिक योगदान जैसी शर्तें भारत के लिए कठिन हो सकती हैं।
कई विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि बोर्ड की संरचना में अध्यक्ष (अमेरिका) को असमान रूप से अधिक अधिकार मिलते हैं, या यदि यह संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय व्यवस्था की भूमिका को कमजोर करता दिखता है, तो भारत के लिए राजनीतिक कीमत बढ़ सकती है। वहीं, समर्थकों का कहना है कि किसी भी मंच पर भारत की मौजूदगी अक्सर “तर्क और व्यावहारिकता” के साथ ग्लोबल साउथ की चिंताओं को आगे रखती रही है, इसलिए भागीदारी से भारत अपना दृष्टिकोण प्रभावी ढंग से रख सकता है।
अगला कदम क्या हो सकता है
रिपोर्ट का संकेत है कि भारत जल्दबाजी से बचते हुए अन्य प्रमुख शक्तियों के फैसलों पर नजर रखेगा—न सबसे पहले शामिल होने की होड़ में, न ही खुद को अलग-थलग दिखाने के मूड में। यदि बोर्ड का दायरा सीमित, शर्तें स्पष्ट और भूमिका पर व्यापक सहमति होती है, तभी नई दिल्ली आगे बढ़ने पर विचार कर सकती है।