भारत में महिलाओं पर गिरी एआई और डीपफेक हिंसा की गाज
एआई से बनी तस्वीरें और डीपफेक अब सिर्फ ‘फेक कंटेंट’ नहीं रहे, बल्कि महिलाओं के खिलाफ डिजिटल यौन उत्पीड़न और निजता-हनन का बड़ा माध्यम बनते जा रहे हैं. बढ़ते मामलों के बीच राष्ट्रीय महिला आयोग ने साइबर कानूनों की समीक्षा और तेज कार्रवाई के लिए कई सुधार सुझाए. रिपोर्ट में बताया गया कि डीपफेक स्कैम, मॉर्फ तस्वीरें और ऑनलाइन प्राइवेसी उल्लंघन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.
समस्या कितनी गंभीर हो गई है
भारत में एआई-जनित तस्वीरें, मॉर्फ फोटो और डीपफेक वीडियो तेजी से फैल रहे हैं, जिससे महिलाओं की निजता, प्रतिष्ठा और सुरक्षा सीधे प्रभावित हो रही है. रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) ने 5 दिसंबर 2025 को दिल्ली में बैठक कर महिलाओं और लैंगिक अल्पसंख्यकों पर बढ़ते ऑनलाइन हमलों—जैसे साइबरस्टॉकिंग, नकली प्रोफाइल, बिना अनुमति फोटो/वीडियो फैलाना और डीपफेक—पर चिंता जताई और इसे मानवाधिकार मुद्दा बताया.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऐसी घटनाओं में अक्सर पीड़ित तब शिकायत करती हैं जब नुकसान हो चुका होता है. कंटेंट किसने बनाया, कहां से फैला, और इसे सभी प्लेटफॉर्म से हटाने की प्रक्रिया—ये सब इतने जटिल हो गए हैं कि पीड़ितों के लिए त्वरित राहत पाना कठिन होता है.
महिला आयोग की सिफारिशें क्या हैं
राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने मौजूदा साइबर कानूनों की समीक्षा की मांग करते हुए कहा कि डीपफेक, एआई-जनित कंटेंट और ऑनलाइन प्राइवेसी उल्लंघन को रोकने में वर्तमान प्रावधान कमजोर साबित हो रहे हैं. आयोग का जोर इस बात पर है कि बिना अनुमति एआई-जनित फर्जी तस्वीर/वीडियो को स्पष्ट रूप से अपराध माना जाए, कंटेंट हटाने के लिए ‘तुरंत’ कार्रवाई का प्रावधान हो और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़े.
आयोग और विशेषज्ञों की चिंता यह है कि आईटी एक्ट, आपराधिक कानून और सिविल उपाय अक्सर प्रतिक्रियात्मक रहते हैं—यानी तब सक्रिय होते हैं जब नुकसान हो चुका होता है. जबकि डिजिटल दुनिया में नुकसान की गति बहुत तेज है: एक बार कंटेंट वायरल हुआ तो बार-बार सामने आकर मानसिक तनाव बढ़ा सकता है.
टेक्नोलॉजी ने अपराध को कैसे आसान बनाया
रिपोर्ट के अनुसार साधारण ऐप्स और आसानी से उपलब्ध टूल्स से फोटो/वीडियो बदलना बेहद सरल हो गया है और परिणाम इतने वास्तविक लगते हैं कि आम लोग धोखा खा सकते हैं. कुछ मामलों में धमकी, बदला (रिवेंज), और वित्तीय दबाव (जैसे थर्ड-पार्टी लोन ऐप्स) के लिए भी डीपफेक/मॉर्फ का इस्तेमाल किया जा रहा है. नाबालिग लड़कियां भी इस तरह के अपराधों में सबसे ज्यादा जोखिम वाले समूहों में बताई गई हैं.
कानूनी और संस्थागत सुधार क्यों जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि त्वरित राहत का सबसे प्रभावी तरीका ‘टेकडाउन + पहचान’ है: कंटेंट तुरंत हटे, सबूत सुरक्षित हों और प्लेटफॉर्म्स जांच में सहयोग करें. रिपोर्ट में यह भी संकेत है कि निचली अदालतों को अधिक सक्षम बनाना, साइबर सेल की क्षमता बढ़ाना, और शिकायत प्रक्रिया को सरल करना जरूरी है ताकि पीड़ितों को हाई कोर्ट तक जाने की मजबूरी न बने.
- एआई-जनित अश्लील/मॉर्फ कंटेंट को स्पष्ट अपराध की श्रेणी में लाना
- बिना अनुमति कंटेंट के लिए तेज हटाने/ब्लॉकिंग प्रक्रिया
- प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और समय-सीमा आधारित अनुपालन
- साइबर सेल और फॉरेंसिक क्षमता का विस्तार
- पीड़ित-केंद्रित त्वरित राहत: मानसिक, कानूनी और डिजिटल सहायता
कुल मिलाकर यह रिपोर्ट बताती है कि एआई-टूल्स के लोकतंत्रीकरण ने रचनात्मकता के साथ-साथ शोषण की क्षमता भी बढ़ाई है, और अब चुनौती यह है कि कानून, प्रवर्तन और प्लेटफॉर्म नीति तीनों को उसी गति से अपडेट किया जाए.